Tuesday, January 20, 2026

मैं खुश हूँ

क़तरा-क़तरा अश्क़ों से ख़त में लिखती हूँ,
शिकायतों को ख़ामोशी में सुलाकर मैं खुश हूँ।

आईने से रोज़ सवाल करती हूँ,
बिखरी सही पर खुद में मैं खुश हूँ।

पूछे जो कोई मेरी ख़ामोशी का सबब,
होंठों की हल्की हँसी—मैं खुश हूँ।

टूटे ख़्वाबों को आँचल में बाँध लिया,
दुनिया के सामने आज भी मैं खुश हूँ।

रातें जानें मेरी जागी हुई सिसकियाँ,
सुबह से बस इतना कहती हूँ—मैं खुश हूँ।

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